आंख शब भर मेरी लगती नहीं क्यों

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कयामत की रात ये ढलती नहीं क्यों

खिजा की रुत भी बदलती नहीं क्यों

क्याबतलाऊ मैं तुझको ऐ दिलबर

तन्हा रुत अब गुजरती नही क्यों

टुटा है जब से ख्वाब मेरी आँखों का

आंख शब भर मेरी लगती नहीं क्यों

अब्र आते है बरसते हैं चले जाते है

कली दिल की मगर खिलती नहीं क्यों

     बैठी हूँ बीच दरिया में मगर

   प्यास ये मेरी बुझती नहीं क्यों

               (अनु )

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4 responses to this post.

  1. Posted by onkar sharma on 02/01/2012 at 4:25 अपराह्न

    you have written very nice lines,thanks

    प्रतिक्रिया

  2. एक फिल्मी गीत याद आया…
    उम्मीद की कोई शमां जलती नहीं,
    ये रात क्यूं, गम की मेरे, ढलती नहीं

    प्रतिक्रिया

  3. Very well finished lines, Ma’am .
    Touching one,
    hats off, just keep it up.

    प्रतिक्रिया

  4. बहुत सुंदर रचना है

    प्रतिक्रिया

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