कितने चुपचाप से लगते है शजर शाम के बाद

उसने देखा न कभी एक नजर शाम के बाद
कितने चुपचाप से लगते है शजर शाम के बाद

गर जानना हो हाले दिल मेरा ऐ सनम
देखना चाँद के दर्पण में मुझे शाम के बाद

इतने चुप की रास्ते को भी नहीं याद होगा
छोड देगे किसी रोज ये नगर शाम के बाद

शाम से पहले मस्त परिंदे अपनी उड़ानों में
छुप जाते है इन धोसलो में वो शाम के बाद

तुमने सूरज कभी देखा नहीं इस रात का दर्द
कितने बेरंग से लगते हैं शहर शाम के बाद

लौट के आएगा वो जरूर किसी रोज ‘अनु’
आस पर खोल के रखते है दर शाम के बाद

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5 responses to this post.

  1. उसने देखा न कभी एक नजर शाम के बाद
    कितने चुपचाप से लगते है शजर शाम के बाद

    और

    तुमने सूरज कभी देखा नहीं इस रात का दर्द
    कितने बेरंग से लगते हैं शहर शाम के बाद

    बहुत अच्छे लगे. बधाई.

    प्रतिक्रिया

  2. बहुत ही अच्छी ग़ज़ल. मतला तो बेहद अच्छा है.

    प्रतिक्रिया

  3. शाम से पहले मस्त परिंदे अपनी उड़ानों में
    छुप जाते है इन धोसलो में वो शाम के बाद
    बेहद असरदार पक्तियां

    प्रतिक्रिया

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