कौन जीता है रुत बदलने तक

फना हो जाएगे सम्हलने तक

कौन जीता है रुत बदलने तक

जश्न कर जिंदगी के हमराही

साथ है रास्ता बदलने तक

पढ़ भी लो उम्र के हसीं सफहे

रौशनी है चराग जलने तक

अश्क आँखों में रोक कर रखना

लाजमी है ये रात ढलने तक

धुंध से  भरा है सारा आलम

वो भी है सिर्फ आंख मलने तक

(16/2/2010-अनु)

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2 responses to this post.

  1. aapki shayari ke kamal se ham khiche chale aaye hain..aap bahut hi accha likhti hain…
    behadd khushi hui hai padh kar..

    प्रतिक्रिया

    • अदा जी बहुत आभार आपका …… आप मेरे ब्लॉग पर आईं और हौसला बढ़ाया ……. वैसे मै आपको बता दूँ कि मुझे गजल या कविता लिखते हुए कुल लगभग दस दिन हुए हैं . इस से पहले कविता के नाम पर कभी कलम भी नहीं पकड़ी … आप लोगों का सहयोग रहा तो आगे भी लिखती रहंगे .. कृतज्ञता ज्ञापित हो

      प्रतिक्रिया

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